
आत्मनि निश्चयबोध,-स्थितयो रत्नत्रयं भवक्षतये ।
भूतार्थ-पथ-प्रस्थित,-बुद्धेरात्मैव तत्त्रितयम् ॥12॥
आत्मदर्श-अवगम-स्थिति, रत्नत्रय ही भवक्षय करता ।
निश्चयपथ आश्रित आत्मा ही रत्नत्रयस्वरूप होता॥
अन्वयार्थ : आत्मा में जो निश्चयबोध-स्थितिरूप रत्नत्रय है अर्थात् सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञानसम्यक्चारित्र है; वह संसार-नाश का कारण है । वह रत्नत्रय, कोई अन्य पदार्थ नहीं; किन्तु जिन भव्य जीवों की बुद्धि, भूतार्थ मार्ग में स्थित है अर्थात् शुद्धनिश्चयनय का आश्रय करने वाली है, उन भव्य जीवों की आत्मा ही सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञान-सम्यक्चारित्रस्वरूप है ।