
सम्यक्सुखबोधदृशां, त्रितयमखण्डं परात्मनो रूपम् ।
तत्तत्र तत्परो य:, स एव तल्लब्धिकृतकृत्य: ॥13॥
सम्यग्दर्शन-ज्ञान-सुख त्रय, अखण्ड हैं परमात्म स्वरूप ।
परमात्मा में लीन रहें जो, वे होते कृतकृत्य स्वरूप॥
अन्वयार्थ : सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञान-सम्यक्चारित्र - ये तीनों, आत्मा के ही अखण्डरूप हैं; इसलिए जो पुरुष, परमात्मा में लीन हैं अर्थात् परमात्मा के आराधक हैं, उनको सम्यग्दर्शनादि की प्राप्ति होती है और वे कृतकृत्य हो जाते हैं ।