+ रत्नत्रय का स्वरूप -
अग्नाविवोष्णभाव:,सम्यग्बोधोऽस्ति दर्शनं शुद्धम् ।
ज्ञातं प्रतीतमाभ्यां, सत्स्वास्थ्यं भवति चारित्रम् ॥14॥
अग्नि उष्णता सम आत्म-ज्ञान - यह प्रतीति सम्यग्दर्शन ।
ऐसा सम्यक् बोध ज्ञान, इन सहित स्वस्थता है चारित॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार अग्नि में उष्णता है, उसी प्रकार आत्मा में ज्ञान है - ऐसी दृढ़ प्रतीति का नाम सम्यग्दर्शन है; आत्मा का जो भलीभाँति ज्ञान, वही सम्यक्ज्ञान है तथा सम्यग्दर्शन- सम्यग्ज्ञानसहित आत्मा में समीचीन स्वस्थता ही सम्यक्चारित्र है ।