
आत्मभुवि कर्मबीजात्, चित्ततरुर्यत्फलं फलति जन्म ।
मुक्त्यर्थिना स दाह्यो, भेद-ज्ञानोग्र-दावेन ॥20॥
आत्मभूमि में कर्मबीज से, मनोवृक्ष पर जन्म फले ।
भस्म करे वह बीज मुमुक्षु, भेदज्ञान-दावानल से॥
अन्वयार्थ : आत्मरूपी भूमि में कर्मरूपी बीज से उत्पन्न हुआ मनरूपी वृक्ष, संसाररूपी फल को फलता है, इसलिए जिनको जन्म से मुक्त होने की इच्छा है , वे भेदज्ञानरूपी जाज्वल्यमान अग्नि से उस चित्तरूपी वृक्ष को जलाएँ ।