+ स्व-पर ज्ञानरूपी कतकफल से आत्मतत्त्व की प्राप्ति -
अमलात्मजलं समलं, करोति मम कर्मकर्दस्तदपि ।
का भीति: सति निश्चित,-भेदकरज्ञानकतकफले ॥21॥
कर्म-कीच मम अमल आत्मजल, मलिन करे तो भी क्या भय ?
स्व-पर भेद-विज्ञान कतकफल होने से मैं हूँ निर्भय॥
अन्वयार्थ : अत्यन्त निर्मल आत्मा को कर्मरूपी कीचड़ मैला करे तो भी मुझे कोई भय नहीं है क्योंकि निश्चय से स्व-पर के भेद को करने वाला ज्ञानरूपी कतकफल (फिटकरी) मेरे पास मौजूद है ।