+ संसार में मेरा कुछ भी नहीं -
अन्योऽहमन्यतेत्, शरीरमपि किं पुनर्न बहिरार्था: ।
व्यभिचारी यत्र सुत:, तत्र किमरय: स्वकीया: स्यु: ॥22॥
मैं तन से भी भिन्न सदा, तो बाह्य पदार्थों की क्या बात ?
यदि अपना सुत ही अनिष्ट तो, अन्य शत्रुओं की क्या आस॥
अन्वयार्थ : मैं अन्य हूँ तथा शरीर भी मुझसे अन्य है तो प्रत्यक्ष बाह्य स्त्री, पुत्रादि पदार्थ तो मुझसे अवश्य ही भिन्न हैं क्योंकि यदि संसार में अपना पुत्र ही अनिष्ट का करने वाला हो तो वैरी मेरे कैसे हो सकते हैं ?