
व्याधिस्तुदति शरीरं, न माममूर्तं विशुद्धबोधमयम् ।
अग्निर्दहति कुटीरं, न कुटीरासक्तमाकाशम् ॥23॥
जैसे अग्नि जलाती घर को, तद्गत नभ जलता न कभी ।
तन विनष्ट हो रोगों से मैं ज्ञान अमूर्तिक अविनाशी॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार किसी झोपड़ी में लगी हुई अग्नि, झोपड़ी को ही जलाती है, किन्तु उसके मध्य में रहे आकाश को नहीं; उसी प्रकार शरीर में नाना प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं, लेकिन वे रोग, उस शरीर को ही नष्ट करते हैं, किन्तु शरीर में स्थित निर्मल ज्ञानमयी आत्मा को नहीं ।