
वपुराश्रितमिदमखिलं, क्षुधादिभिर्भवति किमपि यदसातम् ।
नो निश्चयेन तन्मे, यदहं बाधा-विनिर्मुक्त: ॥24॥
देहाश्रित सब दु:ख क्षुधादिक, जड़ तन में ही होते है ।
निश्चय से मैं देह नहीं हूँ , अत: नहीं बाधा मुझमें॥
अन्वयार्थ : भूख, प्यास आदि कारणों से दु:ख उत्पन्न होते हैं, किन्तु वे समस्त दु:ख, मेरे शरीर में ही होते हैं; लेकिन निश्चयनय से यह शरीर मेरा नहीं है क्योंकि मैं समस्त प्रकार की बाधाओं से रहित हूँ ।