+ कर्म से उत्पन्न विकल्प भी शुद्ध आत्मा के नहीं -
कुर्यात् कर्म विकल्पं, किं मम तेनातिशुद्धरूपस्य ।
मुख-संयोगज-विकृते:, न विकारी दर्पणो भवति ॥26॥
शुद्धस्वरूपी मुझ आतम का, क्या कर सकते कर्म विकल्प ।
मुख मलीन दिखता दर्पण में, किन्तु न मैला हो दर्पण॥
अन्वयार्थ : मुख के संयोग से उत्पन्न हुए विकार से अर्थात् मलिन मुख के सम्बन्ध से जिस प्रकार दर्पण मलिन नहीं होता; उसी प्रकार कर्म चाहे कितने ही विकल्प क्यों न करें, किन्तु अत्यन्त शुद्धस्वरूप मुझ आत्मा का ये विकल्प, कुछ भी नहीं कर सकते ।