+ शरीरादि भी कर्म से ही उत्पन्न -
आस्तां बहिरुपधिचय:, तनुवचनविकल्पजालमप्यपरम् ।
कर्मकृतत्वान्मत्त:, कुतो विशुद्धस्य मम किञ्चित् ॥27॥
दूर रहे यह बाह्य उपाधि, तनवाणी अरु जालविकल्प ।
कर्मजन्य हैं अत: विशुद्ध, स्वभावी मेरे नहिं किञ्चित्॥
अन्वयार्थ : बाह्य स्त्री, पुत्र आदि उपाधि तो दूर रहो; किन्तु शरीर, वचन और विकल्प भी कर्म से किए गये हैं । मैं विशुद्ध हूँ, इसलिए मेरा कुछ भी नहीं है ।