
कर्म परं तत्कार्यं, सुखमसुखं वा तदेव परमेव ।
तस्मिन् हर्षविषादौ, मोही विदधाति खलु नान्य: ॥28॥
कर्म और तज्जन्य सुखादिक, भी मुझसे हैं भिन्न सदा ।
मोही उनमें हर्ष-विषाद करें, नहिं ज्ञानी करें कदा॥
अन्वयार्थ : कर्म भिन्न है तथा जो कर्मों के सुख-दु:खादि कार्य हैं, वे भी मुझसे भिन्न ही हैं । कर्म के सुख-दु:खादि फलों में निश्चय से मोही जीव ही हर्ष-विषाद करता है, अन्य नहीं ।