+ लोक में मोक्षाभिलाषी पुरुष ही सुखी -
कर्म न यथा स्वरूपं, न तथा तत्कार्यकल्पनाजालम् ।
तत्रात्ममतिविहीनो, मुमुक्षुरात्मा सुखी भवति ॥29॥
जैसे कर्म भिन्न हैं वैसे, भिन्न कल्पना सुख-दु:खरूप ।
इनमें जो नहिं करे अहं मति, वही मुमुक्षु सुखस्वरूप॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार कर्म, आत्मा का स्वरूप नहीं है, उसी प्रकार कर्म का सुख-दु:ख आदि कार्य, उनकी कल्पना, उनका समूह भी आत्मा का स्वरूप नहीं है; इसलिए कर्म तथा कर्मफल, जो सुख-दु:ख आदि रूप हैं, उनमें जो मुमुक्षु भव्य जीव, आत्मबुद्धि नहीं करता, वही भव्य आत्मा, संसार में सुखी है ।