+ कर्म की भिन्नता का वर्णन -
कर्मकृतकार्यजाते, कर्मैव विधौ तथा निषेधे च ।
नाहमतिशुद्धबोधो, विधूतविश्वोपधिर्नित्यम् ॥30॥
कर्मजन्य कार्यों के होने, या अभाव में कारण कर्म ।
कर्मोपाधि-विहीन सदा मैं, निर्मल शुद्ध ज्ञान निष्कर्म॥
अन्वयार्थ : कर्म द्वारा किये हुए जो सुख-दु:खरूप कार्य, उन कार्यों के विधान में तथा निषेध में कर्म ही है अर्थात् कर्म ही कर्ता है; किन्तु मैं अत्यन्त निर्मल ज्ञान का धारी हूँ क्योंकि मैं सदैव समस्त प्रकार के कर्मोंपाधियों से रहित हूँ ।