
बाह्यायामपि विकृतौ, मोही जागर्ति सर्वदात्मेति ।
किं नोपभुक्त-हेो, हें ग्रावाणमपि मनुते ॥31॥
यथा धतूरा खाकर नर को, पत्थर भी सोना लगता ।
वैसे मोही प्राणी को यह, बाह्य-जगत अपना लगता॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार कोई मनुष्य धतूरे को खा लेता है तो उसे पत्थर भी सोना मालूपड़ता है; उसी प्रकार जो मनुष्य मोही है अर्थात् जिसे हिताहित का ज्ञान नहीं है, वह मनुष्य बाह्य स्त्री-पुत्रादि विकृति को आत्मा ही मानता है ।