
सति द्वितीये चिन्ता, कर्म ततस्तेन वर्तते जन्म ।
एकोऽस्मि सकलचिन्ता, रहितोऽस्मि मुमुक्षुरिति नियतम् ॥32॥
परद्रव्यों से चिन्ता, उससे कर्म और उनसे संसार ।
'मैं हूँ एक सकल चिन्ता से रहित,' मुमुक्षु करें विचार॥
अन्वयार्थ : द्वितीय वस्तु के होने पर चिन्ता होती है, चिन्ता से कर्मों का आगमन होता है और कर्मों से संसार में जन्म होता है; इसलिए निश्चय से मोक्ष की इच्छा करने वाला मैं अकेला हूँ तथा समस्त प्रकार की चिन्ताओं से रहित हूँ ।