+ मोक्षाभिलाषी को अन्य पदार्थों सम्बन्धी चिन्ता का अभाव -
यादृश्यपि तादृश्यपि, परतश्चिन्ता करोति खलु बन्धम् ।
किं मम तया मुमुक्षो:, परेण किं सर्वदैकस्य ॥33॥
परद्रव्यों की जैसी चिन्ता होती वैसे बँधते कर्म ।
मुझ मुमुक्षु को चिन्ता से क्या? मैं तो सदा एक निष्कर्म॥
अन्वयार्थ : जिस-जिस प्रकार की जो जो चिन्ता होती है, वह-वह उस-उस प्रकार के बन्ध को करने वाली होती है । मैं तो मोक्ष की इच्छा करने वाला हूँ, इसलिए मुझे उस चिन्ता से क्या प्रयोजन है? मैं तो सदा एक हूँ, अत: मुझे अन्य पदार्थों से भी क्या प्रयोजन है?