
मयि चेत: परजातं, तच्च परं कर्म विकृतिहेतुरत: ।
किं तेन निर्विकार:, केवलमहममलबोधात्मा ॥34॥
पर से हुआ चित्त वह पर है, कर्म हेतु है विकृति का ।
मै अविकारी ज्ञान-स्वरूपी, मैं हूँ उनसे भिन्न सदा॥
अन्वयार्थ : मेरी आत्मा में जो मन है, वह मुझसे भिन्न है क्योंकि मन, पर-पदार्थ से उत्पन्न हुआ है । जिससे मन उत्पन्न हुआ है - ऐसा वह कर्म भी मुझसे भिन्न है क्योंकि वह विकार को करने वाला है । मैं तो निश्चय से विकाररहित और निर्मल ज्ञान का धारी हूँ ।