+ चैतन्यस्वरूप का वर्णन -
चैतन्यमसम्पृक्तं, कर्मविकारेण यत्तदेवाहम् ।
तस्य च संसृतिजन्म,-प्रभृतिन किञ्चित्कुतश्चिन्ता ॥36॥
कर्म-विकारों से अलिप्त, चैतन्य-स्वरूपी मैं ही हूँ ।
जन्म-मरण नहिं है चेतन के, फिर क्यों नहिं निश्चिन्त रहूँ ?
अन्वयार्थ : जो चैतन्य, कर्मों के विकारों से अलिप्त है, वही चैतन्य मैं हूँ और संसार में उस चैतन्य के जन्म-मरण आदि कुछ भी नहीं हैं, फिर किसकी चिन्ता करनी चाहिए?