
मन को समझाने की रीति
नृत्वतरोर्विषयसुखच्छायालाभेन किं मन:पान्थ !
भवदु:खक्षुत्पीड़ित, तुष्टोऽसि गृहाण फलममृतम् ॥38॥
रे मन पंथी! नरभव-तरु के, विषय-सुखों की छाया से ।
क्यों सन्तुष्ट हुआ? क्षुत् पीड़ित, तृप्ति लहो अमृत फलसे॥
अन्वयार्थ : संसार के दु:खरूपी क्षुधा से दु:खित अरे मनरूपी बटोही ! तू क्यों मनुष्यरूपी वृक्ष से विषय-सुखरूपी छाया के लाभ से सन्तुष्ट है? अमृत फल को ग्रहण कर!