+ मुनिराजों के चित्त में निरालम्ब मार्ग का ही अवलम्बन -
स्वान्तं ध्वान्तमशेषं, दोषोज्झितमर्कबिम्बमिव मार्गे ।
विनिहन्ति निरालम्बे संचरदनिशं मुनीशानाम् ॥39॥
दोष-रहित मन मुनीश्वरों का, निरालम्ब पथ में गतिशील ।
सूर्य बिम्ब सम घोर तिमिर का, नाश करें वे मुनि सुशील॥
अन्वयार्थ : समस्त दोषों से रहित सूर्य के प्रतिबिम्ब के समान मुनीश्वरों का मन निरालम्ब मार्ग में ही गमन करता है तथा निरालम्ब मार्ग में गमन करने के कारण वे समस्त जगत् के अन्धकार को दूर कर देते हैं ।