
संविच्छिखिना गलिते, तनुूषाकर्मदनमयवपुषि ।
स्वमिव स्वं चिद्रूपं, पश्यन् योगी भवति सिद्ध: ॥40॥
तन-साँचे में कर्म-मोम-तन, ज्ञान-अग्नि से जब पिघले ।
नभवत् निज चैतन्यरूप को, लख कर योगी सिद्ध बनें॥
अन्वयार्थ : सम्यग्ज्ञानरूपी अग्नि के द्वारा जिस समय शरीररूपी मूषा में से कर्मरूपी मोस्वरूप शरीर पिघल कर निकल जाता है, उस समय आकाशवत् अपने चैतन्यरूप को देखने वाला योगी सिद्ध होता है ।