
अहमेव चित्स्वरूप:-चिद्रूपस्याश्रयो मम स एव ।
नान्यत्किमपि जडत्वात्, प्रीति: सदृशेषु कल्याणी ॥41॥
मै ही चित् स्वरूप हूँ मेरा, आश्रय भी चैतन्यस्वरूप ।
अन्य सभी जड़ अत: न प्रीति, प्रीति श्रेष्ठ हो सदृश मैं॥
अन्वयार्थ : मैं ही चैतन्यस्वरूप हूँ और मेरे चैतन्यस्वरूप का आश्रय, चैतन्य ही है । चैतन्य से भिन्न वस्तुएँ, न चैतन्यस्वरूप हैं और न चैतन्य की आश्रय हैं, अपितु वे जड़ हैं; अत: मेरी प्रीति, उनमें नहीं हो सकती क्योंकि प्रीति, समानजातीय पदार्थों में ही कल्याण को करने वाली होती है ।