+ स्व-पर विवेक से ही सिद्धत्व की प्राप्ति -
स्व-पर-विभागाऽवगमे, जाते सम्यक् परे परित्यक्ते ।
सहजैक-बोधरूपे, तिष्ठत्यात्मा स्वयं सिद्ध: ॥42॥
निज-पर भेदज्ञान होने पर, त्याज्य वस्तु का त्याग करे ।
सहज ज्ञानमय एकरूप में, जम कर आत्मा मुक्ति लहे॥
अन्वयार्थ : जिस समय आत्मा में स्व-पर के विभाग का ज्ञान हो जाता है और त्यागने योग्य वस्तु का त्याग हो जाता है; उस समय स्वाभाविक निर्मल ज्ञानस्वरूप जो अपना रूप है, उसमें आत्मा ठहरता है और स्वयं सिद्ध हो जाता है ।