
प्रतिपद्यमानमपि च, श्रुताद्विशुद्धं परात्मनस्तत्त्वम् ।
उररीकरोतु चेत:, तदपि न तच्चेतसो गम्यम् ॥44॥
यह विशुद्ध परमात्म-तत्त्व, जो शास्त्रों द्वारा है प्रतिपाद्य ।
मन से ग्रहण करो तो भी यह, कहा गया मन से नहिं ग्राह्य॥
अन्वयार्थ : शास्त्र के द्वारा भलीभांति कहे हुए भी अत्यन्त विशुद्ध परमात्मतत्त्व को चाहे मन से स्वीकार करो तो भी वह मन से गम्य नहीं है अर्थात् मन उसको जान नहीं सकता है ।