
अहमेकाक्यद्वैतं, द्वैतमहं कर्मकलित इति बुद्धे: ।
आद्यमनपायि मुक्ते,-रितरविकल्पं भवस्य परम् ॥45॥
'एकरूप मैं' यह अद्वैत, 'कर्म सहित'- यह द्वैत विचार ।
प्रथम बुद्धि ही शिवकारण है, इतर बुद्धि से है संसार॥
अन्वयार्थ : 'मैं अकेला हूँ'- इस प्रकार की जो बुद्धि है, वह तो अद्वैतबुद्धि है और कर्मों से सहित हूँ - इस प्रकार की जो बुद्धि है, वह द्वैतबुद्धि है । इन दोनों बुद्धियों में पहली जो अविनाशी अद्वैतबुद्धि है, वह तो मोक्ष की कारण है और दूसरी जो द्वैतबुद्धि है, वह संसार की कारण है ।