+ निर्विकल्प चित्त से परमानन्द की प्राप्ति -
गत-भावि-भवद्भावा,-ऽभाव-प्रतिभावभावितं चित्तम् ।
अभ्यासाच्चिद्रूपं, परमानन्दाऽन्वितं कुरुते ॥47॥
तीन काल के सब पदार्थ से, भेदज्ञान मम चित्त बसे ।
यही भावना होने से, चेतन में परमानन्द भरे॥
अन्वयार्थ : भूत-भविष्यत्-वर्तानकाल के पदार्थों के भाव-अभाव सम्बन्धी भेदज्ञान की भावना से भाया हुआ चित्त अभ्यास से चैतन्यस्वरूप को परमानन्द सहित करता है ।