
बद्धं पश्यन् बद्धो, मुक्तं मुक्तो भवेत् सदात्मानम् ।
याति यदीयेन पथा, तदेव पुरमश्नुते पान्थ: ॥48॥
बँधा देखने से बँधता, जो मुक्त लखे मुक्ति लहे ।
मार्ग चले जो जिस नगरी का, उसी नगर में जा पहुँचे॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार जो पथिक, जिस पुर के मार्ग से गमन करता है, वह उसी पुर को प्राप्त होता है; उसी प्रकार जो जीव, आत्मा को सदा बँधा हुआ देखता है, वह कर्मों से बद्ध रहता है और जो पुरुष, आत्मा को कर्मों से रहित देखता है, वह मुक्त होता है ।