+ मन को शिक्षा -
मा गा बहिरन्तर्वा, साम्य-सुधा-पान-वर्धितानन्द !
आस्स्व यथैव तथैव च, विकारपरिवर्जित: सततम् ॥49॥
साम्य-सुधारस पीकर रे मन!, अन्तर-बाहर कहीं न जा ।
सर्व विकार मिटें जिस विधि से, उसी विधि में थिर हो जा॥
अन्वयार्थ : समतारूपी अमृत के पीने से जिसका आनन्द बढ़ा है - ऐसे हे मन! तू बाहर तथा भीतर की ओर गमन मत कर! जिस रीति से तू समस्त प्रकार के विकारों से रहित हो, उसी प्रकार से रह ।