
तज्जयतियत्र लब्धे, श्रुतभुवि मत्यापगाऽतिधावन्ती ।
विनिवृत्ता दूरादपि, झटिति स्वस्थानमाश्रयति ॥50॥
श्रुत-भूमि पर दौड़ रही, मति-सरिता शीघ्र दूर से ही ।
निज घर लौटे, जिसे प्राप्त कर, चेतनतत्त्व महान विजयी॥
अन्वयार्थ : जिस चैतन्यरूप तत्त्व के प्राप्त होने पर शास्त्ररूपी भूमि में अत्यन्त दौड़ती हुई बुद्धिरूपी नदी दूर से ही लौट कर, शीघ्र ही अपने स्थान को प्राप्त हो जाती है - ऐसा वह चैतन्यरूपी तत्त्व, सदा इस लोक के जयवन्त रहे ।