
तन्नमत गृहीताखिल,-कालत्रयगतजगत्त्रयव्याप्ति ।
यत्रास्तमेति सहसा, सकलोऽपि हि वाक्परिस्पन्द: ॥51॥
तीन काल अरु तीन लोक में, व्याप्त हुआ जो चेतनतत्त्व ।
जिसे प्राप्त कर वचन योग भी, हो विनष्ट है उसे नमन !
अन्वयार्थ : तीन काल और तीन जगत् की व्याप्ति जिसने ग्रहण की है तथा जिसके होने पर समस्त वाणी का परिस्पन्द शीघ्र नष्ट हो जाता है; उस चैतन्य को नमस्कार हो ।