+ समस्त विकल्पजालरूपी वृक्ष को नष्ट करने वाले चैतन्यतत्त्व को नमस्कार -
तन्नमत विनष्टाखिल,-विकल्पजालद्रुाणि परिकलिते ।
यत्र वहन्ति विदग्धा, दग्ध-वनानीव हृदयानि ॥52॥
नष्ट हुए हैं सब विकल्प तरु, जैसे जला हुआ जंगल ।
चित्त गहें मुनिगण जिसको लख, उस चेतन को सदा नमन !
अन्वयार्थ : जिस चैतन्यस्वरूप की प्राप्ति के होने पर जो मुनिगण, सर्वथा नष्ट हो गए हैं विकल्परूपी वृक्ष जिनसे - ऐसे हृदय को जले हुए वन के समान धारण करते हैं, उस चैतन्यतत्त्व को नमस्कार हो ।