
नयनिक्षेपप्रमिति-प्रभृतिविकल्पोज्झितं परं शान्तम् ।
शुद्धानुभूति-गोचर-महमेकं धाम चिद्रूपम् ॥54॥
नय-प्रमाण-निक्षेप विकल्पों, से विहीन जो परम प्रशान्त ।
अनुभवगोचर मात्र एक मैं, चेतनरूप तेज सुखधाम॥
अन्वयार्थ : जिसमें नय, निक्षेप, प्रमिति आदि किसी प्रकार के विकल्प नहीं हैं, जो उत्कृष्ट है, शान्त है, शुद्धात्मानुभव के गोचर है तथा एक है; वह चैतन्यरूपी तेज ही मैं हूँ ।