
ज्ञाते ज्ञातमशेषं, दृष्टे दृष्टं च शुद्ध-चिद्रूपे ।
नि:शेष-बोध्य-विषयौ, दृग्बोधौ यन्न तद्भिन्नौ ॥55॥
शुद्ध आत्मा ज्ञात हुआ तो, सब जाना अरु सब देखा ।
सकल वस्तुविषयी दृग-ज्ञान, न शुद्धातम से भिन्न कहा॥
अन्वयार्थ : चैतन्यस्वरूप तेज के जानने पर, समस्त वस्तु जानी जाती है और देखने पर समस्त वस्तु देखी जाती है क्योंकि समस्त ज्ञेय पदार्थ हैं विषय जिनके - ऐसे दर्शन और ज्ञान, आत्मस्वरूप ही हैं, आत्मा से भिन्न नहीं ।