+ आत्मतत्त्व का दर्शन होने पर बाह्य पदार्थों में प्रीति नहीं -
भावे मनोहरेऽपि च, काचिन्नियता च जायते प्रीति: ।
अपि सर्वा: परमात्मनि, दृष्टे तु स्वयं समाप्यन्ते ॥56॥
रम्य वस्तुओं में हो जाती, है निश्चित ही किञ्चित् प्रीति ।
परमातम के दर्शन से, हो विनष्ट सब जग से प्रीति॥
अन्वयार्थ : अत्यन्त मनोहर पदार्थों से कोई विचित्र निश्चित प्रीति उत्पन्न हो जाती है, किन्तु जिस समय परमात्मा का दर्शन हाेता है, उस समय उन अन्य पदार्थों से प्रीति की समाप्ति हो जाती है ।