+ बुद्धिमान् पुरुषों से सम्बद्ध विद्यमान कर्म भी अविद्यमान के समान -
सन्नप्यसन्निव विदां, जनसामान्योऽपि कर्मणो योग: ।
तरणपटूनामृद्ध:, पथिकानामिव सरित्पूर: ॥57॥
कर्म उदय सबको पर बुध को, होने पर भी नहिं जैसा ।
कुशल तैरने में जो उसको, सरित्-पूर भी नहिं जैसा॥
अन्वयार्थ : कर्मों का सम्बन्ध, सभी संसारी प्राणियों के लिए समान होने पर भी बुद्धिमान पुरुष के लिए वह विद्यमान होने पर भी अविद्यमान के समान ही है । जिस प्रकार तैरने में चतुर तैराक को बढ़ा हुआ नदी का प्रवाह, विद्यमान होने पर भी अविद्यमान के समान ही है ।