
मृगयमाणेन सुचिरं, रोहणभुवि रत्नमीप्सितं प्राप्य ।
हेयाऽहेय-श्रुतिरपि, विलोक्यते लब्ध-तत्त्वेन ॥58॥
बहुत देर तक रत्न खोजने, पर हो दैव-योग से प्राप्त ।
तत्त्व प्राप्त करने पर वैसे, हेय ग्राह्य का करो विचार॥
अन्वयार्थ : रोहण पर्वत की भूमि में चिर काल से रत्न को ढूँढने वाला मनुष्य, दैवयोग से इष्ट रत्न को पाकर भी जिस प्रकार 'यह रत्न, हेय है अथवा उपादेय है' - इस बात का विचार करता है; उसी प्रकार जिस मनुष्य को वास्तविक तत्त्व की प्राप्ति हो गई है, उसको भी 'यह तत्त्व, हेय है अथवा उपादेय है' - ऐसा विचार करना चाहिए ।