+ तत्त्वज्ञानी का विचार -
कर्मकलितोऽपि मुक्त:, सश्रीको दुर्गतोऽप्यहमतीव ।
तपसा दु:ख्यपि च सुखी, श्रीगुरुपादप्रसादेन ॥59॥
कर्मसहित हूँ किन्तु मुक्त हूँ, मैं दरिद्र पर लक्ष्मीवान् ।
तप से दु:खी किन्तु मैं सुखिया, गुरुचरणों की कृपा महान्॥
अन्वयार्थ : यद्यपि ज्ञानावरण आदि कर्मों से मेरी आत्मा संयुक्त है तो भी मैं श्रीगुरु के चरणारविन्द की कृपा से सदा मुक्त हूँ । यद्यपि मैं अत्यन्त दरिद्री हूँ तो भी मैं श्रीगुरु के चरणों के प्रसाद से लक्ष्मी से सहित हॅूं । यद्यपि मैं तप से दु:खी हूँ तो भी श्रीगुरु के चरणों की कृपा से मैं सदा सुखी ही हूँ अर्थात् मुझे संसार में किसी प्रकार का भी दु:ख नहीं है ।