
बोधादस्ति न किञ्चित्, कार्यं यद्दृश्यते मलात्तन्मे ।
आकृष्टयन्त्रसूत्रात्,-दारुनर: स्फुरति नटकानाम् ॥60॥
नहीं ज्ञान से कार्य जगत् में, जो दिखता वह कर्म करे ।
क्योंकि यन्त्र का सूत्र खींचने, से ही पुतली नृत्य करे॥
अन्वयार्थ : जो कुछ मेरे कार्य मौजूद है अर्थात् जो कुछ कार्य मैं कर रहा हूँ, वह कर्म की ही कृपा से कर रहा हूँ, ज्ञान से कुछ भी कार्य नहीं हो रहा क्योंकि नट के द्वारा खींचे हुए यन्त्र के सूत्र से ही पुतली नाचती है ।