+ 'निश्चय पञ्चाशत्' अधिकार का उपसंहार -
(वसन्ततिलका)
तृणं नृपश्री: किमु वच्मि तस्यां; न कार्यमाखण्डल-सम्पदोऽपि ।
अशेष-वाञ्छा-विलयैक-रूपं; तत्त्वं परं चेतसि चेन्ममास्ति ॥62॥
यदि समस्त इच्छा-विहीन, यह तत्त्व बसे मेरे मन में ।
राज-लक्ष्मी का क्या कहना, सुरपति वैभव भी तृण है॥
अन्वयार्थ : समस्त प्रकार की इच्छाओं को दूर करने वाला चैतन्यरूपी तत्त्व, यदि मेरे मन में मौजूद है तो समस्त राजलक्ष्मी मेरे लिए तृण के समान है; इसलिए मैं उस विषय में क्या कहूँ? अरे! इन्द्र की सम्पदा भी मेरे लिए किसी काम की नहीं है ।