
भ्रूक्षेपेण जयन्ति ये रिपुकुलं, लोकाधिपा: केचन;
द्राक् तेषामपि येन वक्षसि दृढ, रोप: समारोपित: ।
सोऽपि प्रोद्गतविक्रम: स्मरभट:, शान्तात्मभिर्लीलया;
यै: शस्त्रग्रहवर्जितैरपि जित:, तेभ्यो यतिभ्यो नम: ॥1॥
भृकुटी टेढ़ी करके जिसने, रिपु-समूह को किया परास्त ।
उसके उर में भी दृढ़ता से, काम-बाण ने किया प्रहार॥
ऐसे पराक्रमी योद्धा को, खेल-खेल में शस्त्र-विहीन ।
शान्त चित्त जो मुनिवर जीतें, उन्हें नवाते हम निज शीश॥
अन्वयार्थ : संसार में अनेक राजा ऐसे भी हैं, जो अपनी भृकुटी के विक्षेप मात्र से ही वैरियों के समूह को जीत लेते हैं; उन राजाओं के हृदय में शीघ्र ही जिस कामदेवरूपी योद्धा ने दृढ़ता से बाण को समारोपित कर दिया है - ऐसे अत्यन्त पराक्रमी कामदेवरूपी सुभट को भी समस्त प्रकार के शस्त्रों से रहित तथा जिनकी आत्मा क्रोधादि कषायों का नाश होने से शान्त हो गई है - ऐसे यतियों ने जीत लिया है, उन यतियों को मेरा नमस्कार है अर्थात् वे यतीश्वर मेरी रक्षा करें ।