+ ब्रह्मचर्य का धारी कौन? -
आत्मा ब्रह्म विविक्तबोधनिलयो, यत्तत्र चर्यं परं;
स्वाङ्गाऽसङ्गविवर्जितैकमनस:, तद्बह्मचर्यं मुने: ।
एवं सत्यबला: स्वमातृभगिनी,-पुत्रीसमा: प्रेक्षते;
वृद्धाद्या विजितेन्द्रियो यदि तदा, स ब्रह्मचारी भवेत् ॥2॥
भिन्न ज्ञानमय ब्रह्म आत्मा, ब्रह्मचर्य इसमें थिरता ।
तन में नहीं ममत्व जिन्हें, उन मुनि को ब्रह्मचर्य होता॥
ऐसा होने पर वृद्धादिक, नारी को जो मात-समान ।
अथवा बहन सुता सम देखे, वही जितेन्द्रिय पुरुष महान॥
अन्वयार्थ : जिनका मन शरीर की आसक्ति से रहित है अर्थात् जिनके मन में शरीर-विषयक कुछ भी आसक्तता नहीं है - ऐसे मुनि, समस्त पदार्थों से भिन्न अपने ज्ञानस्वरूप आत्मब्रह्म में लीन रहते हैं, एकाग्रता करते हैं, उसे ही ब्रह्मचर्य कहते हैं तथा जो वृद्धादि स्त्रियों को अपनी माता, बहन व पुत्री के समान देखता है, वही सच्चा ब्रह्मचारी है ।