+ मुनिराज को अतिचार लगने पर प्रायश्चित्त का विधान -
स्वप्ने स्यादतिचारिता यदि तदा, तत्रापि शास्त्रोदितं;
प्रायश्चित्तविधिं करोति रजनी, भागानुगत्या मुनि: ।
रागोद्रेकतया दुराशयतया, सा गौरवात्कर्मण:;
तस्य स्याद्यदि जाग्रतोऽपि हि पुन:, तस्यां महच्छोधनम् ॥3॥
लगें स्वप्न में यदि अतिचार, मुनीश्वर को तो श्रुत अनुसार ।
रात्रि विभाग करके वे मुनि, प्रायश्चित्त विधि करते स्वीकार॥
रागोद्रेक दुराशय या फिर, तीव्र कर्मवश जागृति में ।
लगें यदि अतिचार उन्हें, तो करते भारी संशोधन॥
अन्वयार्थ : यदि किसी कारण से स्वप्न में मुनि को अतिचार लग जाए तो मुनि, रात्रि का विभाग कर, (शयनावस्था त्याग कर) शास्त्र में कहे हुए प्रायश्चित्त को स्वीकार करते हैं । यदि जाग्रत अवस्था में, राग के उद्रेक से, खोटे आशय से या कर्म की गुरुता से मुनि को अतिचार लग जाए तो उस अतिचारिता के होने पर वे बड़ा भारी संशोधन करते हैं ।