
नित्यं खादति हस्तिसूकरपलं, सिंहो बली तद्रति:;
वर्षेणैकदिने शिलाकणचरे, पारावते सा सदा ।
न ब्रह्मव्रतमेति नाशमथवा, स्यान्नैव भुक्तेर्गुणात्;
तद्रक्षां दृढ़ एक एव कुरुते, सार्धोन: संयम: ॥4॥
एक बार रति करे वर्ष में, सिंह निरन्तर माँस भखे ।
गज-शूकर का किन्तु कबूतर, कंकड़ खा रतिलीन रहे॥
भोजन करने या न करने, से व्रत का सम्बन्ध नहीं ।
ब्रह्मचर्य की रक्षा करता, मुनि-मन का दृढ़ संयम ही॥
अन्वयार्थ : भोजन के गुण से अर्थात् भोजन करने से ब्रह्मचर्य व्रत नष्ट होता है तथा भोजन न करने से ब्रह्मचर्य व्रत पलता है - ऐसी बात नहीं है क्योंकि अत्यन्त बलवान सिंह, सदा हाथी तथा सूअर के माँस को खाता है, फिर भी वर्ष में एक ही बार रति करता है । जबकि कबूतर सदा पत्थर के टुकड़े खाता है तो भी वह सदैव रति करता रहता है अर्थात् ब्रह्मचर्य का पालन , एक मात्र साधु के मन का दृढ़ संयम ही करता है ।