+ संयम के दो प्रकार -
चेत: संयमनं यथावदवनं, मूल-व्रतानां मतं;
शेषाणां च यथाबलं प्रभवतां, बाह्यं मुनेर्ज्ञानिन: ।
तज्जन्यं पुनरान्तरं समरसी,-भावेन चिच्चेतसो;
नित्यानन्दविधायि कार्यजनकं, सर्वत्र हेतुर्द्वयम् ॥5॥
मूलगुणों की यथार्थ, रक्षा करना है मन का संयम ।
उत्तर-गुण की यथाशक्ति रक्षा, है मुनि का बाह्य संयम॥
चेतन और चित्त का समरस-भाव, यही अन्त: संयम ।
नित्यानन्द-विधायी कार्य-जनक हैं ये दोनों संयम॥
अन्वयार्थ : ज्ञानी मुनि के जीवन में मूलगुण का पालन यथावत् तथा उत्तरगुण का पालन यथाशक्ति होता हैं, उनका रक्षण करना, वह तो बाह्य मन का संयम है । उस संयम से उत्पन्न सदैव आनन्द को करने वाले चैतन्य के समरसी भाव से जो मन का संयम होता है, वह अन्तरंग मन का संयम है । सर्वत्र यह दोनों प्रकार का संयम ही कारण है ।