+ स्त्री-संगति के त्याग हेतु व्रती को प्रयत्न करना आवश्यक -
चेतोभ्रान्तिकरी नरस्य मदिरा,-पीतिर्यथा स्त्री तथा;
तत्सङ्गेन कुतो मुनेर्व्रतविधि:, स्तोकोऽपि सम्भाव्यते ।
तस्मात्संसृतिपातभीतमतिभि:, प्राप्तैस्तपोभूमिकां;
कर्तव्यो व्रतिभि: समस्तयुवति:, त्यागे प्रयत्नो महान् ॥6॥
जैसे मदिरा-पान पुरुष को, भ्रमित करे वैसे नारी ।
उसकी संगति से किञ्चित् भी, व्रत-विधान हो सके नहीं॥
अत: तपो भू प्राप्त यति-मति, जो भवसागर से भयभीत ।
करें महान प्रयत्न नारियों, को तजने का सभी व्रती॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार मदिरापान, मनुष्य के मन में भ्रान्ति को करने वाला होता है, उसी प्रकार स्त्री भी मनुष्य के चित्त में भ्रान्ति उत्पन्न करने वाली होती है, इसलिए ऐसी स्त्री-संगति से मुनि के थोड़े भी व्रत के विधान की सम्भावना नहीं रहती; अत: जिन मुनियों की मति, संसार में भ्रमण करने से भयभीत है और जो मुनि-भूमिका को प्राप्त हो गये हैं, उनको समस्त स्त्रियों के त्याग का बड़ा भारी प्रयत्न करना चाहिए ।