
मुक्तेर्द्वारि दृढ़ार्गला भवतरो:, सेकेऽङ्गना सारिणी;
मोहव्याधविनिर्मिता नरमृगस्याबन्धने वागुरा ।
यत्संगेन सतामपि प्रसरति, प्राणातिपातादि तत्;
तद्वार्तापि यतेर्यतित्वहतये, कुर्यान्न सा किं पुन: ॥7॥
नारी मुक्ति-द्वार-अर्गला, भव-तरु-सिंचन की नाली ।
नर-मृगबन्धन हेतु मोहमय, व्याध-विनिर्मित दृढ़ जाली॥
जिसकी संगति में सज्जन भी, हिंसादिक से होते लिप्त ।
जिसकी वार्ता भी मुनित्व को, हने करे नहिं कौन अनिष्ट॥
अन्वयार्थ : स्त्री, मुक्ति-द्वार को रोकने वाली मजबूत अर्गला है, संसाररूपी वृक्ष को सींचने वाली नाली है, मनुष्यरूपी मृगों को बाँधने के लिए मोहरूपी व्याध द्वारा बनाया हुआ जाल है क्योंकि जिस स्त्री के संग से सज्जनों का भी जीवन नष्ट हो जाता है और जिसकी बात भी मुनियों के मुनिपने का नाश करने के लिए होती है; वह स्त्री, संसार में और क्या-क्या नहीं कर सकती? अर्थात् समस्त प्रकार के अनिष्टों को कर सकती है ।