+ प्रीतिपूर्वक स्त्री का मुख देखते ही समस्त व्रत-तप की समाप्ति -
तावत्पूज्यपदस्थिति: परिलसत्, तवद्यशो जृम्भते;
तावच्छुभ्रतरा गुणा: शुचिमन:, तावत्तपो निर्मलम् ।
तावद्धर्मकथापि राजति यते:, तावत्स दृश्यो भवेत्;
यावन्न स्मरकारि हारि युवते, रागान्मुखं वीक्षते ॥8॥
तब तक उत्तम पद है यति का, तब तक शोभित यश बढ़ता ।
तब तक ही गुण निर्मल रहते, तप अरु मन निर्मल रहता॥
तब तक दर्शनीय है वह यति, सुन्दर उसकी धर्मकथा ।
जब तक कामोत्तेजक रमणी-मुख नहिं प्रीति सहित लखता॥
अन्वयार्थ : जब तक यति, प्रीति से काम को उद्दीपन करने वाले मनोहर स्त्री के मुख को नहीं देखते, तब तक ही वे यति पूज्यपद में अर्थात् उत्तमपद में स्थित रहते हैं, उन यति का ही शोभायमान यश, वृद्धि को प्राप्त होता है, उनके गुण ही निष्कलंक रहते हैं, उन यतीश्वर का मन ही पवित्र बना रहता है, उनका तप ही निर्मल रहता है, उनकी धर्मकथा ही शोभित रहती है, वे ही देखने योग्य बने रहते है; किन्तु उक्त स्त्री का मुख देखते ही ये समस्त बातें नहीं रहती, इसलिए यतियों को स्त्री का मुख कदापि नहीं देखना चाहिए ।