
तेजोहानिमपूततां व्रतहतिं, पापं प्रपातं पथो;
मुक्ते रागितयाङ्गनास्मृतिरपि, क्लेशं करोति धु्रवम् ।
तत्सान्निध्यविलोकनप्रतिवच:, स्पर्शादय: कुर्वते;
किं नानर्थपरम्परामिति यते:, त्याज्याबला दूरत: ॥9॥
राग सहित नारी-चिन्तन भी, तेज और व्रत नष्ट करे ।
पापों से अपवित्र करे नर, को शिवपथ से भ्रष्ट करे॥
तो उसका सान्निध्य विलोकन, वचनालाप और स्पर्श ।
क्या अनर्थ नहिं करे अत:, नारी का संग दूर से त्याज्य॥
अन्वयार्थ : स्त्री का रागसहित स्मरण भी तेज की हानि करता है, अपवित्रता करता है, व्रतों का नाश करता है, पाप की उत्पत्ति करता है, मोक्ष के मार्ग से मनुष्यों को गिराता है और निश्चय से नाना प्रकार के क्लेशों को उत्पन्न करता है तो उस स्त्री के समीप रहना, उसको देखना, उसके साथ वचनालाप और स्पर्शादि करना किस-किस अनर्थ को नहीं करेंगे?