+ यतियों को समस्त स्त्रियों के साथ प्रीति कष्टकारक -
वेश्या स्याद्धनतस्तदस्ति न यते:, चेदस्ति सा स्यात्कुतो;
नात्मीया युवतिर्यतित्वमभवत्, तत्त्यागतो यत्पुरा ।
पुसोऽन्यस्य च योषितो यदि रति:, छिन्नो नृपात्तत्पते:;
स्यादापज्जनन-द्वयक्षयकरी, त्याज्यैव योषा यते: ॥10॥
वेश्या तो मिलती है धन से, निर्धन यति को कैसे प्राप्त ।
निज नारी भी मिले न उसको, क्योंकि किया पहले से त्याग॥
संग करें परनारी का तो, पति अरु राजा देंवें दण्ड ।
अत: उभय भवनाशक नारी, यति को पूर्णरूप से त्याज्य॥
अन्वयार्थ : यदि मुनि, वेश्या के लोलुपी बनें तो वेश्या उनको मिल नहीं सकती क्योंकि वेश्या अधिक धन होने पर ही प्राप्त होती है और धन, यति के पास नहीं होता है । यदि कदाचित् धन होवे तो भी वेश्या उनको कैसे मिल सकती है? अपनी स्त्री भी यति को प्राप्त नहीं हो सकती क्योंकि प्रथम तो स्त्री-त्याग से ही यतिपना हुआ है । यदि दूसरे पुरुष की स्त्री के साथ यति रति करें तो वे राजा से छेदन आदि दण्ड को प्राप्त होते हैं तथा उस स्त्री के पति के द्वारा भी बहुत कष्टों को पाते हैं, इसलिए यतियों को दोनों जन्मों का नाश करने वाली स्त्री का सर्वथा त्याग करना चाहिए ।