+ ब्रह्मचर्य की महिमा का वर्णन -
दारा एव गृहं न चेष्टकचितं, तत्तैर्गृहस्थो भवेत्;
तत्त्यागे यतिरादधाति नियतं, स ब्रह्मचर्यं परम् ।
वैकल्यं किल तत्र चेत्तदपरं, सर्वं विनष्टं व्रतं;
पुंसस्तेन विना तदा तदुभय,-भ्रष्टत्वमापद्यते ॥11॥
घर न बने ईंटों से, रमणी से ही नर गृहस्थ होता ।
उसे त्यागने से यति निश्चय, ब्रह्मचर्य उत्तम धरता॥
यदि वह खण्डित हो जाए तो, अन्य सभी व्रत होते नष्ट ।
ब्रह्मचर्य बिन यतिपना अरु, श्रावकपन भी होय विनष्ट॥
अन्वयार्थ : ईंटों से व्याप्त घर, घर नहीं कहलाता, अपितु स्त्री का नाम ही घर है, उन स्त्रियों के कारण ही मनुष्य गृहस्थ कहलाता है तथा स्त्री के सर्वथा त्याग से ही यति, उत्कृष्ट तथा श्रेष्ठ निश्चय ब्रह्मचर्य को धारण करते हैं । यदि उस ब्रह्मचर्य में किसी कारण से विकलता हो जाए तो दूसरे समस्त व्रत नष्ट हो जाते हैं । इस प्रकार ब्रह्मचर्य के बिना पुरुष का व्रतीपना तथा गृहस्थपना दोनों ही नष्ट हो जाते हैं ।